Saturday, November 28, 2015

सूचना एवं जन संपर्क विभाग, हिमाचल प्रदेश की मासिक पत्रिका "हिमप्रस्थ" के नवम्बर, 2015 अंक में कविता "वह बुजुर्ग" प्रकाशित l








मासिक वेब पत्रिका "हस्ताक्षर" के प्रधान संपादक श्री के .पी . अनमोल द्वारा मेरे साँझा कविता संकलन "ग़ज़ल - कविता सप्तक" की समीक्षा l ह्रदय तल की गहराइयों से आभार अनमोल जी ...!



संवेदनशील हृदय की शाब्दिक प्रस्तुति: ग़ज़ल-कविता सप्तक - के. पी. 
अनमोल
“जब भी लगे कि नहीं गुज़र रहा है
मुश्किल दौर जीवन का ऐ दोस्त!
तो हौसला ना हारना तू कभी
क्यूंकि है दौर कौनसा
जो नहीं गुज़रा आज तक,
गुज़र गया जो दौर कल था
और गुज़र जायेगा वो भी
जो दौर आज है”
इस कठिन समय में बहुत ज़रूरी हैं ऐसी पंक्तियाँ। जो हौसला दे, वक़्त की मार को सहने की ताक़त दे। मनोज चौहान की ये पंक्तियाँ इनकी कविता ‘मुश्किल दौर’ का शुरूआती हिस्सा है। यह कविता जीवन के मुश्किल दौर में धैर्य बनाये रखने व अपनी हिम्मत को जुटाये रखने का सार्थक सन्देश देती है। यह कविता शामिल है ‘ग़ज़ल-कविता सप्तक’ नामक एक साझा संकलन में जो जितेन्द्र चौहान जी के संपादन में पार्वती प्रकाशन, इंदौर से प्रकाशित हुआ है। संकलन में कुल 9 नये-पुराने रचनाकारों की काव्य की विविध विधाओं की रचनाएँ सम्मिलित हैं।
पुस्तक में इस प्रकार की कई सार्थक रचनाएँ हैं, जो मन को सुकून और जीवन को ऊर्जा देती हैं। सभी रचनाओं में सामाजिक सरोकारों से जुड़ा सार्थक चिंतन दिखता है।
“माँ की झिड़की के पीछे है अविरल प्रेम
सच्चा है पिता के रोबीले चेहरे के पीछे छिपा प्यार..............नहीं होता प्रेम का पर्याय”
हरिप्रिया जी इस तरह की पंक्तियों के द्वारा अपनी चारों कविताओं में प्रेम की उपस्थिति, उसके स्वरूप और प्रकृति से परिचित कराती हैं।
“लगता जैसे
पिता पेड़ की जड़
और छाया माँ”
“बरसे पैसा
पर पड़ा है सूखा
सुख का खेत”
“प्रसव पीड़ा
नहीं भेद करती
बेटा या बेटी”
वंदना सहाय जी अपनी इन समर्थ हायकु रचनाओं के द्वारा जीवन के कई पहलुओं को छूती हैं। अपने एक हायकु से कुछ ख़ास ‘विषाक्त लोगों’ को कुछ इस तरह आईना दिखाती हैं-
“माँ कह भी
बूढी होते ही भेजा
बुचड़खाने”
वहीँ एक चुटीले हायकु से वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का नज़ारा दिखा जाती हैं-
“नया मदारी
पर जनता देखें
खेल पुराना”
बाज़ारीकरण के दौर में ईमानदारी की दुर्गति को दर्शाता इनका एक अच्छा हायकु-
“बिकाऊ हुआ
झूठ के बाज़ार में
ये हरिश्चंद्र”
और इस कठिन समय में उम्मीद बंधाता और युक्ति सुझाता एक हायकु, देखें-
“काली है रात
भोर लाने के लिए
सूरज ढूंढो!”
लेकिन कहीं-कहीं हायकु की तीन अलग-अलग पंक्तियों की प्रकृति को भूल ये भी एक पंक्ति के टुकड़े करती नज़र आती हैं, देखें-
“हुआ है दिल
मरुस्थल औ’ यादें
नागफनी-सी”
9 रचनाकारों के संकलन में केवल तीन रचनाकार हरिप्रिया जी, मनोज चौहान जी व वंदना सहाय जी ही प्रभावित कर पाते हैं, वैसे इनके अलावा पुस्तक में श्रीनारायणलाल ‘श्रीश’, मृणालिनी घुले, रामकृष्ण श्रीवास्तव, उमा गुप्ता, डॉ. अंजुल कंसल तथा डॉ. सोना सिंह भी शामिल हैं। हालाँकि रामकृष्ण श्रीवास्तव जी की ‘दिशा हीन’ और डॉ. सोना सिंह की ‘बदली दुनिया’ भी अच्छी कविताएँ कही जा सकती है।
संकलन की अधिकतर रचनाओं के बारे में यही कहना ठीक होगा कि ये संवेदनशील हृदय की शाब्दिक प्रस्तुति है। पुस्तक की भूमिका से बकौल मनोज पंचाल जी, “कविता या ग़ज़ल कहना आसान काम नहीं है। शब्दों को मोतियों की तरह चुनना पड़ता है और एक अनोखी लय से तादात्म्य बनाना पड़ता है। फिर भी कविता का यह भोलापन है कि वह हर किसी को कवि हो जाने का अवसर देती है। इसका एक लाभ यह होता है हर कोई अपने मनोभाव, प्रेरणा, संवेदना या निरे अनुभव को सार्थक ढंग से प्रस्तुत कर लेता है। वह बड़ा कवि हो या न हो, एक संवेदनशील प्रस्तोता तो बन ही जाता है।”
- के. पी. अनमोल

Saturday, October 10, 2015

मासिक वेब पत्रिका हस्ताक्षर के अक्टूबर , 2015 अंक में "कविता - कानन" स्तम्भ में 2 कवितायें "लिंगडू की गठरियाँ " और "पहाड़ी पर घर" प्रकाशित l

ऑनलाइन लिंक (Online Link) :







कविताएँ
लिंगडू की गठरियाँ

उस पहाड़ी और
सर्पीली सड़क के
हर मोड़ पर
मकानों के झुरमुट
के समीप से
जब भी गुजरती है
कोई गाड़ी
नन्हें हाथ हर बार
उठ जाते हैं
ऊपर की ओर
उठाये हुए
हाथों में
लिंगडू की गठरियाँ

मटमैले से कपड़े पहने
मगर चेहरे पर
कोमल व निर्मल
भाव लिए

रूकती नहीं
जब कोई गाड़ी
हताश हो जाते हैं वे
मगर फिर
लौट आती है
चमक
उन आँखों में
लगते ही  ब्रेक
किसी गाड़ी की

दौड़ पड़ते हैं सभी
एक साथ
और जब
खरीद ली जाती है
उनमें से
जिस किसी की भी
लिंगडू की गठरियाँ
हर्षित हो उठते हैं वे

यह छोटी-सी जीत
बढ़ा देती है
उनका हौसला
और जगा देती है उम्मीद
भविष्य में कुछ बड़ा
और बेहतर
कर देने के लिए

वे थमा देंगे
कमाई किए चंद रुपये
घर जाते ही
माँ के हाथ में
ताकि जुटाया जा सके
जरुरत का सामान
घर के लिए

और छोटी पिंकी भी
जोड़ रही है हिसाब
ये सोचकर कि
ले लिया जाएगा उसे
अब नया बस्ता
स्कूल जाने के लिए

मगर नहीं लौटेगी घर
अभी वह
अपने साथियों के
बगैर
जो कि खड़े हैं अब भी
गढ़ाए हुए नज़र
दूर तलक
सड़क के मोड़ पर

आश्वस्त हैं वे भी
कि रुकेगी फिर
कोई गाड़ी
और बिक जाएंगी
उनके  भी हाथों में
थामी हुई
लिंगडू की गठरियाँ


(लिंगडू अर्थात लिंगड़- यह हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में पाया जाने वाला फर्न कुल का एक पौधा है l प्रदेश के पहाड़ों के नदी-नालों के आस-पास उगने वाले लिंगड़ की सब्जी को लोग खूब पसंद करते हैंl लिंगड़ का वानस्पतिक नाम पैट्रिडियम एक्यूलिन्यूम हैl)


पहाड़ी पर घर

अपने क्वॉर्टर की
बालकनी से
निहारता हूँ जब
पहाड़ी पर बने
उन घरों को
तो एकाएक ही
कौंध पड़ते हैं
कई सवाल
ज़हन में

कैसे जुटाते हैं वे
रोजमर्रा की
ज़रुरत का सामान
मीलों की पैदल
थका देने वाले
रास्ते की चढ़ाई
और उतराई
बाधा बन खड़ी है
हमेशा से ही
उनके और
शहर के बीच

सर्दी के मौसम में
हालात हो जाते हैं
और भी भयावह
पहाड़ी पर गिरा बर्फ
और उसकी ठिठुरन
कंपा देती है
उन्हें अन्दर तक

पहाड़ मोह लेते हैं
मन सैलानियों का
चांदी की परत-सी
दिखती है
बर्फ की चादर
मगर नहीं दिखता
कोई भी आतुर
जान लेने को
वेदना
उनके भीतर की

दूर पहाड़ी के
उस घर की खिड़की से
निहारता है बूढ़ा सुखिया
और खांसता है
चिलम गुडगुडाते हुए

चिंता की लकीरें
उभर आई हैं
उसके माथे पर
वह करता है हिसाब
ठण्ड से मर चुकी
बकरियों का
बर्फ पर फिसलने से
मुन्नी के पावं पर
चढ़े प्लास्टर का
और दूर शहर में
पढ़ रहे बेटे की
फीस का

दरवाज़े पर हुई
आहट
रोक देती है
विचारों का
प्रबल वेग
क्षण भर के लिए

चाय और सत्तू देने आई
पत्नी के लौटते ही
पुनः खो जाता है वह
पहाड़ी जीवन के
गणित को
सुलझाने में

- मनोज चौहान

Tuesday, October 6, 2015

भागलपुर , बिहार से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका "संभाव्य" के अक्टूबर , 2015 अंक में पृष्ठ संख्या 30 पर कविता "वह बुजुर्ग" प्रकाशित l

संभाव्य’ अंतराष्ट्रीय स्तर की पूर्णतः निःशुल्क हिंदी त्रैमासिक है। वर्तमान समय में विश्व के 40 देशों के पाठक सहित भारत के 84 शहरों के सहृदयों का स्नेह इस पत्रिका को प्राप्त है।
इसका ई-संस्करण विश्वग्राम के सभी सुधी पाठकों एवं स्नेहीजन के लिए नीचे दिए गए लिंक पर सहजता के साथ सुलभ है। मुद्रित संस्करण यथासंभव रचनाकारों, हिंदी के लिए समर्पित संस्था और संस्थानों को उपलब्ध कराया जाता है।

ऑनलाइन लिंक (Online Link) :

संभाव्य (अक्टूबर - 201 5 अंक )