Saturday, September 26, 2015

हस्ताक्षर पत्रिका के सितम्बर, 2015 अंक के "चिठ्ठी -पत्री" स्तम्भ में छपी मेरी कविता "बुझ गया वो दीया" के बारे में चंद पंक्तियाँ l


जन-मत
आदरणीय संपादक महोदय,
सादर  नमस्कार


'हस्ताक्षर' उत्कृष्ट साहित्य का मासिक दस्तावेज का अगस्त 2015 का अंक पढ़ा, बहुत ही सूझबूझ के साथ प्रदत्त सामग्रियों में से मुझे ‘बुरा हाल  पंचायत घर’ (डॉ. प्रदीप शुक्ल) कविता ने  मेरे गांव के बदहाल पंचायत घर की न सिर्फ याद दिला दी बल्कि सारा का सारा दृश्य जैसे मेरी आंखों के सामने चलचित्र की भांति घूम गया। ज्योत्स्ना 'कपिल' जी की दोनों लघुकथाएं हमारे समाज की वास्तविकता से परिचित कराने के लिए बहुत पुख्ता एवं संक्षिप्त  दस्तावेज हैं। कृष्णवीर सिंह सिकरवार का आलेख 'अंतर्जाल पर हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की स्थिति' हमारे देश में बढ़ती हुई वेब पत्रिकाओं की सूचना तो देता ही है, साथ ही लेखकों के लिए ई-माध्यमों द्वारा अपनी सक्रियता को बढ़ाने के मार्ग का भी प्रशस्तीकरण करता है। मनीषा श्री की रचना ‘एक नव विवाहित बेटी का अपनी माँ के नाम पत्र’ नारी की स्थिति, अवस्थिति एवं समाज के प्रति एक युवती की सोच तथा समाज की युवती के प्रति सोच एवं जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए बहुत से मार्मिक स्थलों की छूती है। अंत में भारत माता के अमर सपूत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुत कलाम पर रचित कविता 'बुझ गया वो दीया' आंखों में आंसू बरबस ही ले आती है। ‘आज वो दीया/बुझ गया है/मगर कर गया है/आलोकित/अनेकों दीये/जो करते रहेंगे/सदैव ही संघर्ष/अंधेरों से लड़ते हुए’ वर्तमान समाज के किसी भी विवाद से परे मानव एकता के अग्रदूत राष्ट्रपति कलाम का इस संसार को अलविदा कहना हम सभी के लिए ऐसी क्षति है, जिसे कोई दूसरा कभी पूरा नहीं कर सकेगा। भारत में सांप्रदायिकता बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है परंतु राष्ट्रपति कलाम के दिवंगत होने पर न सिर्फ भारत के मुसलमान रोये बल्कि हिंदुओं का सीना भी ह्रदयविदारकता से भर गया।
अच्छी सामग्री के साथ अगस्त 2015 का अंक प्रकाशित करने के लिए सम्पूर्ण संपादक मंडल्‍ा एवं अन्य‍ सहयोगियों को हार्दिक साधुवाद तथा भविष्य के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं।



डॉ. विजेंद्र  प्रताप सिंह
सहायक  प्रोफेसर (हिंदी)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
जलेसर, ज़िला- एटा (उ.प्र)

ईमेल- vickysingh4675@gmail.com

- सुरेन बिश्नोई

No comments:

Post a Comment