Saturday, June 11, 2016

वेब मासिक पत्रिका "हस्ताक्षर" के जून, 2016 अंक में दो कवितायेँ 'बाज़ार' और 'मेरे मार्गदर्शक - पिता और शब्दकोश' प्रकाशित l

कवितायेँ पढ़ने के लिए ऑनलाइन लिंक :





कविता-कानन
बाज़ार
बाज़ार आखिर क्या है?
इंसानी ज़रूरतों को
पूरा करने के लिए ईज़ाद की गई
एक प्राचीन व्यवस्था,
मोल-भाव करते
इंसानों का जमघट
या फिर किसी गरीब बच्चे की
न पूरा होने वाली इच्छाओं को
चिढ़ा देने वाला सम्मोहन?
बाज़ार आखिर क्या है?
एक अमीर के लिए
सुख-सुविधाओं के
साधन जुटाने की जगह
और एक ग़रीब के लिए
चार निवाले भर
कमा लेने की कशमकश
बाज़ार हर आदमी के लिए
अलग अर्थ लिए हुए है
हर रोज़ खुलता है बाज़ार
और शाम को बंद होते-होते
छोड़ जाता है कई सवाल
उस बड़े दूकानदार के लिए
जिसे मुनाफा तो हुआ
मगर पिछले कल जितना नहीं,
एक मध्यम वर्गीय गृहणी के लिए
जो खींच लाई है बिलखते बच्चे को
खिलौनों की दुकान से
मात्र दाम पूछकर ही
इस बहाने से
कि अच्छा नहीं है वह खिलौना
और ग़रीब भोलू के लिए भी
जिसकी रेहड़ी से नहीं बिका है आज
एक भी हस्त-निर्मित सजावटी शो पीस
अपने-अपने सवालों के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु सा फंसते जा रहे हैं
वह बड़ा दुकानदार,
मध्यम बर्गीय गृहणी
और गरीब भोलू भी
कल फिर खुलेगा बाज़ार
मगर क्या भेद सकेंगे वे सब
अपने-अपने
सवालों के चक्रव्यूह को?
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मेरे मार्गदर्शक- पिता और शब्दकोश
जिल्द में लिपटा
पिता का दिया शब्दकोश
अब हो गया है पुराना,
ढल रही उसकी भी उम्र,
वैसे ही
जैसे कि पिता के चेहरे पर भी
नज़र आने लगी हैं झुर्रियां
मगर डटे हैं मुस्तैदी से
दोनों ही अपनी अपनी जगह पर
अटक जाता हूँ कभी
तो काम आता है आज भी
वही शब्दकोश,
पलटता हूँ उसके पन्ने
पाते ही स्पर्श
उँगलियों के पोरों से
महसूस करता हूँ
कि साथ हैं पिता
थामे हुए मेरी ऊँगली
जीवन के मायनों को
समझाते हुए,
राह दिखाते
एक प्रकाशपुंज की तरह
ज़माने की कुटिल चालों से
कदम कदम पर छले गए
स्वाभिमानी पिता
होते गए सख्त बाहर से
वह छुपाते गए हमेशा ही
भीतर की भावुकता को
ताकि मैं न बन जाऊं 
दब्बू और कमजोर
और दृढ़ता के साथ
कर सकूँ सामना
जीवन की हर चुनौती का
उनमें आज भी दफ़न है 
वही गुस्सा
खुद के छले जाने का
जो कि फूट पड़ता है अक्सर
जिसे नहीं समझना चाहता
कोई भी
सीमेंट और बजरी के स्पर्श से
बार-बार ज़ख्मी होते
हाथों व पैरों की उँगलियों के
घावों से
रिसते लहू को
कपड़े के टुकड़ो से बांधते
ढांपते और छुपाते
उफ़ तक न करते हुए
कितनी ही बार
पीते गए हलाहल
अनंत पीड़ा का
संतानों का भविष्य
संवारने की धुन में
संघर्षरत रहकर ता-उम्र
खड़ा कर दिया है आज
बच्चों को अपने पांवो पर
अब चिंताग्रस्त नहीं हैं वे
आश्वस्त हैं
हम सबके लिए
मगर फिर भी
हर बार मना करने पर
चले जाते हैं काम पर आज भी
घर पर खाली रहना
कचोटता है
उनके स्वाभिमान को
पिता आज बेशक रहते हैं
दूर गाँव में
मगर उनका दिया शब्दकोश
आज भी देता है सीख
और एक अहसास
हर पल
उनके साथ होने का


- मनोज चौहान



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